Posts

समान की तलाश

 गोश्त और हड्डी बनकर जीने में गिरावट ज़्यादा है समझदारी कम                                     -----कृष्णमोहन "और कब तक मैं बचाये रख सकता हूँ अपने सीने में सत्तर का उत्तरार्द्ध अस्सी का पूर्वाद्ध अब कुछ और ही दुख चाहिए कुछ और ही बेचैनी यहाँ के रोज़मर्रा में खात्मे के सिवा कुछ नहीं देता दिखायी" (असद ज़ैदी, 'तबादला' शीर्षक कविता से) अपने साकार होने की किसी पद्धति की परिकल्पना और व्यवहार में उसकी परख के बगैर सपने दिवास्वप्नों में बदल जाते हैं। पिछली सदी के आख़िरी दशक में भारतीय राज्य के साम्प्रदायिक चरित्र के उजागर होने और एकध्रुवीय दुनिया में अमरीका के 'जनतांत्रिक' फ़ासीवाद की स्थापना से, समतामूलक समाज के सपने से जुड़ी परिकल्पनाएँ अचानकअप्रासंगिक हो गईं। हर वह व्यक्ति, जो उम्मीद करता था कि भारतीय राज्य शिक्षा और औद्योगिक विकास के माध्यम से आधुनिक और लोकतांत्रिक राज्य में बदल जायेगा, वास्तविक घटनाक्रम के सामने ग़लत साबित हुआ है। हमारे अधिकांश बुद्धिजीवियों ने इस सचाई का सामना शुतुर्मुर्ग की तरह किया...

ग़ालिबे खस्ता के बग़ैर

ग़ालिबे खस्ता के बग़ैर                        --- कृष्णमोहन  ग़ालिब को अब आमतौर पर हिन्दुस्तान का अंतिम मध्ययुगीन और पहला आधुनिक शायर मान लिया गया है। महाकवि इक़बाल ने जब उन्हें गेटे का समकक्ष कहा था तो उनका आशय यही था। आगे चलकर शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और सिब्ते हसन जैसे विचारकों ने स्पष्ट शब्दों में इसकी घोषणा की। 'दीवाने ग़ालिब' के नागरी संस्करण की भूमिका में अली सरदार जाफ़री लिखते हैं—'ग़ालिब ने मुग़ल संस्कृति की आख़िरी बहार और नयी औद्योगिक संस्कृति के उभरते हुए चिह्न और उनकी कैफ़ियतों को अपने व्यक्तित्व में समो लिया था।' स्पष्ट है कि लेखक यहाँ अपनी नवजागरणवादी चेतना के कारण औपनिवेशिक संस्कृति को औद्योगिक संस्कृति बता रहा है क्योंकि उसके बगैर ग़ालिब में आधुनिक चेतना की कल्पना करना भी उसके लिए असम्भव है। उपनिवेश-पूर्व भारतीय परम्परा में आधुनिकता के आंतरिक तत्त्वों की मौजूदगी को लेकर एक छोर उन विचारकों का है जो आमतौर पर इससे इन्कार करते हैं, और दूसरे छोर पर रामविलास शर्मा हैं जो ऋग्वेद से ही आधुनिकता के तत्त्वों को खोज कर इस...

निर्मल वर्मा की भारतीयता और कलात्मकता का सच

  कृष्णमोहन  निर्मल वर्मा का समूचा चिंतन भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान और व्याख्या को समर्पित है। उनके विचारपरक निबन्धों से गुज़रते हुए पहली अनुभूति एक ऐसे लेखक से रू-ब-रू होने की होती है जो अपनी मान्यताओं के आख़िरी छोर तक पहुँच चुका है और अब उस पर पुनर्विचार या बहस-मुबाहसे की कोई ज़रूरत या गुंजाइश नहीं है। ज़रूरत है उसको बार-बार दुहराने की, ताकि तर्क, बुद्धि और इतिहास जैसे 'पश्चिमी' मूल्यों से आक्रांत भारतीय मन को वापस उसकी सहजता प्रदान की जा सके। वैचारिक निष्ठा का यह विरल उदाहरण अपनी मान्यताओं की जाँच-परख के लिए आकर्षित करता है। यहाँ हम पहले उनके वैचारिक लेखन में आई स्थापनाओं के आलोक में उनकी भारतीयता की अवधारणा पर विचार करेंगे। इसके बाद उनकी कहानियों के संदर्भ में उनकी बहुश्रुत कलात्मकता का भी तनिक परीक्षण करेंगे। भारतीय और यूरोपीय संस्कृति की विशेषताओं को चिह्नित करते हुए निर्मल वर्मा लिखते हैं---'संस्कृति का यह भारतीय स्वरूप पश्चिम की सांस्कृतिक धारा से नितांत भिन्न है।...अतः यूरोप में वैयक्तिक चेतना और धार्मिक विश्वासों के बीच एक चौड़ी खाई खुलती गई, अपनी चेतना में मन...