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टूटी हुई, बिखरी हुई

कृष्णमोहन  शमशेर बहादुर सिंह की प्रसिद्ध कविता 'टूटी हुई, बिखरी हुई' के बारे में कई मिथक प्रचलित हैं, जिनमें से एक यह है कि शमशेर ने इसे डायरी के रूप में लिखा था, और नामवर सिंह ने इसे देखकर कहा कि यह तो कविता है। फिर इसे कविता के रूप में प्रकाशित किया गया। गोया ख़ुद कवि को भी यह भान नहीं था कि उससे कविता हो गई है। आम तौर पर इस कविता को आधुनिक हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम-कविता कहा जाता है, लेकिन इसे सबसे दुरूह कविता का दर्जा भी हासिल है। शमशेर के प्रमुख अध्येताओं में से एक विजयदेवनारायण साही के विचार हम इस शृंखला में पहले देख चुके हैं। उनके दूसरे समकालीन नामवर सिंह ने 1990 में उनकी प्रतिनिधि कविताओं का चयन करते हुए जो भूमिका लिखी उसमें साफ़ कर दिया कि शमशेर की कविताओं के स्थापत्य में प्रवेश करना उनके लिए संभव नहीं है। सो वे बाहर ही बाहर परिक्रमा करेंगे। शेष लोगों ने उन्हें 'कवियों का कवि' कहकर अपने हिस्से का फ़र्ज़ निभाया। इस कविता की पहली पंक्ति को इसका शीर्षक बनाया गया है, और उसकी तर्ज़ पर ही यह मान लिया गया कि इस कविता की कोई सुसंगत व्याख्या संभव नहीं है, बल्कि उसकी अपेक्षा...