समान की तलाश
गोश्त और हड्डी बनकर जीने में गिरावट ज़्यादा है समझदारी कम -----कृष्णमोहन "और कब तक मैं बचाये रख सकता हूँ अपने सीने में सत्तर का उत्तरार्द्ध अस्सी का पूर्वाद्ध अब कुछ और ही दुख चाहिए कुछ और ही बेचैनी यहाँ के रोज़मर्रा में खात्मे के सिवा कुछ नहीं देता दिखायी" (असद ज़ैदी, 'तबादला' शीर्षक कविता से) अपने साकार होने की किसी पद्धति की परिकल्पना और व्यवहार में उसकी परख के बगैर सपने दिवास्वप्नों में बदल जाते हैं। पिछली सदी के आख़िरी दशक में भारतीय राज्य के साम्प्रदायिक चरित्र के उजागर होने और एकध्रुवीय दुनिया में अमरीका के 'जनतांत्रिक' फ़ासीवाद की स्थापना से, समतामूलक समाज के सपने से जुड़ी परिकल्पनाएँ अचानकअप्रासंगिक हो गईं। हर वह व्यक्ति, जो उम्मीद करता था कि भारतीय राज्य शिक्षा और औद्योगिक विकास के माध्यम से आधुनिक और लोकतांत्रिक राज्य में बदल जायेगा, वास्तविक घटनाक्रम के सामने ग़लत साबित हुआ है। हमारे अधिकांश बुद्धिजीवियों ने इस सचाई का सामना शुतुर्मुर्ग की तरह किया...