समान की तलाश

 गोश्त और हड्डी बनकर जीने में गिरावट ज़्यादा है समझदारी कम

                                    -----कृष्णमोहन

"और कब तक मैं बचाये रख सकता हूँ

अपने सीने में सत्तर का उत्तरार्द्ध

अस्सी का पूर्वाद्ध

अब कुछ और ही दुख चाहिए

कुछ और ही बेचैनी

यहाँ के रोज़मर्रा में

खात्मे के सिवा कुछ नहीं देता दिखायी"

(असद ज़ैदी, 'तबादला' शीर्षक कविता से)


अपने साकार होने की किसी पद्धति की परिकल्पना और व्यवहार में उसकी परख के बगैर सपने दिवास्वप्नों में बदल जाते हैं। पिछली सदी के आख़िरी दशक में भारतीय राज्य के साम्प्रदायिक चरित्र के उजागर होने और एकध्रुवीय दुनिया में अमरीका के 'जनतांत्रिक' फ़ासीवाद की स्थापना से, समतामूलक समाज के सपने से जुड़ी परिकल्पनाएँ अचानकअप्रासंगिक हो गईं। हर वह व्यक्ति, जो उम्मीद करता था कि भारतीय राज्य शिक्षा और औद्योगिक विकास के माध्यम से आधुनिक और लोकतांत्रिक राज्य में बदल जायेगा, वास्तविक घटनाक्रम के सामने ग़लत साबित हुआ है। हमारे अधिकांश बुद्धिजीवियों ने इस सचाई का सामना शुतुर्मुर्ग की तरह किया है। पुराने मुहावरों की जुगाली के साथ शाश्वत अनिश्चय की मुद्रा का तालमेल बिठाकर वे भागते भूत की लंगोट पर ही सन्तोष करने को तैयार दिखते हैं। इसीलिए असद ज़ैदी के शब्दों में कहें तो उन्हें 'उत्तर-आधुनिक तरकीबों का इस्तेमाल कर अपनी हैरान-परेशान अन्तरात्मा से निपटना' पड़ता है। सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि ग़ालिब के टूटे हुए आईने की तरह, इन झुठलाये गये सपनों में बसी छवियाँ भी हमारे कवि-लेखकों का पीछा नहीं छोड़तीं। वे उन्हें आत्मनिरीक्षण के लिए एक ऐसी अन्तर्यात्रा पर जाने को प्रेरित करती हैं, जिससे गुज़रकर हालात की नई समझ हासिल की जा सकती है। तभी कोई और 'दु:ख' मिल सकता है।


हमारे संक्रमणकालीन दौर की एक खूबी यह है कि इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य का परस्पर रूपान्तरण तेज़ हो गया है। कई बार इसमें अतीत का भविष्य में और भविष्य का वर्तमान में बोध होता है। सपनों से हाथ धो चुकने के बाद यथार्थ हमारी कल्पना में किसी बुरे सपने की तरह घिर आता है। लेकिन सपने पर सचाई की यह जीत तब तक टिकाऊ नहीं हो सकती, जब तक यह हमारी याददाश्त को नष्ट न कर दे। इसीलिए यथार्थ को बदलने और नये सपने रचने का समूचा संघर्ष अब हमारी स्मृति के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो गया है। आज की कविता की पहचान उसमें सृजित स्वप्न अथवा यथार्थ से नहीं, स्मृति की उसमें निभाई गयी भूमिका से होती है । स्मृतिहीन कविता कैसी भी कोशिश कर ले यथार्थ के तात्कालिक और विद्रूप चित्रण से बच नहीं सकती। और सपने की बात तो खोखली लफ़्फ़ाजी भर रहेगी, जब तक स्मृति और यथार्थ के संयोग से उसका नया जन्म नहीं हो जाता।


"सपने में दिखते हैं जो लोग

कभी एक-दूसरे का पता नहीं पूछते

टेलीफोन नं. नोट नहीं करते

बदलने से वहाँ कुछ नहीं बदलता

वे मानकर चलते हैं कि हो चुका

जो दरअसल होता है होने वाला

वे कहते भी हैं हमसे कुछ नहीं छिपा

होश में आना है ओझल हो जाना"

                 ('हमारे साथ के बीमार')


ध्यान दें कि यहाँ जिस सपने की बात की जा रही है। वह यथार्थ ही है, जो दुःस्वप्न में बदल गया है। विडम्बना यह है कि इसके बावजूद, या शायद इसकी वजह से ही, परस्पर अन्त:क्रिया के लिए संबंध बनाने की इच्छा भी कम से कमतर होती गयी है। कहने को तो संचार-क्रांति हो चुकी है। परिवर्तनों की प्रक्रियाएँ अन्ततः यथास्थिति के पक्ष में आकर दम लेती हैं। नासमझी के चलते हम अपनी घिसी-पिटी धारणाओं को ही सच मानते हैं, जबकि यह तय है कि हमारी चेतना के वापस आते ही सारे भ्रम ओझल हो जायेंगे। असद ज़ैदी के काव्य-संसार में 'होश' शब्द का प्रयोग काफी मानीख़ेज़ है। यहाँ ज़िक्र हमारी भारतीय चेतना का है, जिसका कुछ उल्लेख हम आगे देखेंगे। फ़िलहाल इस सपने का एक और दृश्य देखें, जो बाबरी मस्जिद के विध्वंस की घटना का काव्यान्तरण है-


"यह एक दोपहर की झपकी थी

एक अस्त-व्यस्त सा

स्वप्न था

या किसी का खर्राटा

जिसकी आवाज़ के पर्दे में मेहराब के चटकने की

ख़फ़ीफ़ सी आवाज़ घुल गयी

कुछ गुम्बदें धीमी गति से गिरती चली गयीं

काले-सफेद धुंधलके में।

                                ('कौन नहीं जानता')


यही वह दुर्घटना थी, जो ‘होने वाली' थी। हम मानकर चल रहे थे, 'जो होना था वह पहले ही हो चुका' है और 1947 के बाद से हम किसी दूसरे रास्ते पर चलते आ रहे हैं। किसी ने सच कहा है कि जो क़ौमें अपना इतिहास भूल जाती हैं, वे उसे दुहराने को अभिशप्त हैं। हम अभी बँटवारे के ज़ख्मों के भरने और सूखने की प्रतीक्षा में थे कि कुछ दूरी बने तो उनका रचनात्मक रूपान्तरण हो, लेकिन अयोध्या और गुजरात ने साबित कर दिया कि हम किसी और बड़ी विभीषका की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं। अतीत के भविष्य में बदलने की एक अनुभूति देखें-


"वो एक याद थी जिसे मैं इन्तज़ार में था कि

कुछ धुंधली पड़े तो काम में लूँ

× × × × ×

मैं इसी इन्तज़ार में था, लेकिन मैंने देखा

कि बस एक ही क़दम की दूरी बाक़ी है

और लीजिये ये हुई मुठभेड़।

वो चीज़ जिसे स्मृति जानकर मैं

दूर से देखना चाहता था

दरअसल एक खटका था

भविष्य से वर्तमान की तरफ़ आता हुआ।"

                                         ('एक याद')

1992 हमारे इतिहास का एक वैसा ही विभाजक बिंदु है, जैसा 1757, 1857 या 1947। इसी वर्ष अपनी तमाम संवैधानिक प्रतिज्ञाओं को ठेंगा दिखाकर भारतीय राज्य अपने चारों खम्भों के सहारे साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के पक्ष में खड़ा हुआ था। अपने देश के भविष्य की कल्पना आधुनिक लोकतंत्र के रूप में करने वाले हर भारतीय के लिए इस वर्ष हुई घटना के महत्त्व को समझना अनिवार्य है। ठीक इसी वजह से हर तरह की अलोकतांत्रिक शक्तियाँ इसके निहितार्थों पर लीपा-पोती करने की हर मुमकिन कोशिश करती हैं। ऐसी ही प्रवृत्तियों को जवाब देते हुए असद ज़ैदी कहते हैं-


"नहीं पहिया कभी टेढ़ा नहीं हुआ

नहीं बराबरी की बात कभी हुई ही नहीं

(हो सकती भी न थी)

उर्दू कोई ज़बान ही न थी

अमीरख़ानी कोई चाल ही न थी

मीर बाक़ी ने बनवाई जो

कोई वह मस्जिद ही न थी

नहीं तुम्हारी आँखों में

कभी कोई फ़रेब न था।"

                              ('हलफनामा')


भारतीय संस्कृति की सामासिकता को मिटाकर उस पर एकरूपता को थोपने की हर काररवाई का प्रतिरोध कवि का सबसे पहला सरोकार है । खासतौर पर हिन्दुत्ववादियों ने अपने धर्म को संस्कृति या जीवनशैली आदि बताकर उसे सर्वग्रासी बनाने की चेष्टा की। सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दुत्व को जीवनशैली मानकर इस कोशिश पर अपनी मुहर भी लगा दी। इस प्रकरण का संकेत देखें:


"देखिये हिन्दुत्व की परिभाषा अकादमी ने नहीं

उच्चतम न्यायालय ने तय की है : हम तो

पालन के दोषी हैं

और अगर हम ऐसा बहुत लम्बे समय से

करते चले आ रहे हैं

तो उसे ग़फ़लत नहीं, दूरन्देशी समझा जाना चाहिए।"

                                                     ('दूरभाष')

भारतीय राष्ट्र को हिन्दुत्व की 'संस्कृति' के आधार पर परिभाषित करने की यह कार्ययोजना 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के नाम से जानी जाती है। एक राष्ट्र, एक संस्कृति के बाद एक भाषा का प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण बनता है। इसीलिए तमाम साम्प्रदायिक शक्तियाँ हिन्दी प्रेमी होने का दिखावा करती हैं और उर्दू के रूप में हुए खड़ी बोली के सहज विकास से काटकर उसका संस्कृतनिष्ठ, पण्डिताऊ रूप प्रस्तुत करती हैं। आज़ाद भारत में हिन्दी के विकास को लेकर होने वाले सभी राजकीय प्रयास इसी दिशा में केन्द्रित रहे हैं। अपनी जड़ों से कटी हुई यह 'विशुद्ध' हिन्दी सही अर्थों में किसी की मातृभाषा नहीं बन पाती। लेकिन अपने समर्थकों के उत्साह के कारण यह ग़ैर हिन्दी-भाषी प्रदेशों में अनावश्यक प्रतिक्रिया को ज़रूर प्रेरित करती है। राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय सामंजस्य के बजाय विभेद को उकसाती है, जिससे हमारे अंग्रेज़ीदाँ शासक अभिजात वर्ग को आसानी से बिल्लियों के बीच बन्दर की भूमिका निभाने का मौक़ा मिल जाता है । सहज बोलचाल की हिन्दी-उर्दू, जो दो लिपियों में लिखी जाने वाली एक ही भाषा है, इस कुचक्र का शिकार होकर हाशियों पर बनी रह जाती है। इस विडम्बना का बयान देखें-


"एक दिन इस दुनिया से उर्दू बोलने वालों का

सफाया हो जायेगा

रह जायेगी बस हमारी प्यारी हिन्दी भाषा

दफ़ना देंगे फिर हम अपनी यह कुल्हाड़ी

एक दिन ख़त्म हो जायेंगी

पश्चिम की तरफ़ मुँह करने वाली क़ौमें

हर तरफ़ होगा पूरब की रीत का बोलबाला"

                                       ('पूरब दिशा')


उर्दू का विरोध जब उर्दू बोलने वालों का विरोध बन जाता है, तब वह आत्मघाती हो जाता है। विचार की लड़ाई को हथियार से लड़ने की परम्परा हमारे देश में पुरानी है। यहाँ उर्दू बोलने वालों का सफ़ाया करने वाली कुल्हाड़ी को दफ़नाने की मंशा सफल होती नहीं दीखती, क्योंकि ग़लत कारण से ख़ून का स्वाद चखने वालों को बहानों की कमी नहीं पड़ती। 1857 के बाद अंग्रेज़ों की प्रेरणा से जो 'नया ज़माना' आया, उसमें भारतेन्दु से लेकर मुहम्मद हुसैन आज़ाद तक ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उर्दू को मुसलमानों की भाषा माना। इस तरह दोनों के विरोधी भी एक हो गये। 150 वर्षों में यह जो साम्प्रदायिक कॉमनसेंस बना है, उसकी बुनियाद में कुछ इस तरह के तर्क भी हैं कि हिन्दी और उर्दू में मेल नहीं हो सकता, क्योंकि एक बाएँ से दाएँ लिखी जाती है, और दूसरी दाएँ से बाएँ। इसी तरह हिन्दू-मुसलमान का मामला है। एक पूरब की तरफ मुँह करके पूजा करता है, दूसरा पश्चिम की ओर मुँह करके नमाज पढ़ता है। ऐसे बचकाने तर्कों का कोई क्या प्रतिवाद करे, लेकिन कवि उनके उद्देश्यों को दुहराकर ही उनकी नादानी को प्रकट करता है। 'पूरब' और 'पश्चिम' की बात में छिपी हुई विडम्बना भी है। असली पश्चिम की भूमिका को समझने के बजाय पूरब वाले आपस में ही पूरब-पश्चिम कर रहे हैं।


भाषा हमारे सामाजिक विकास का माध्यम भी होती है और पैमाना भी। उसका बँटवारा देश की आसन्न गुलामी और बँटवारे से भी अधिक घातक है। हमारे हिन्दी-उर्दू- भाषी समाज की मौजूदा मानसिक विकलांगता की प्रमुख वजह यही है। भाषा अनुभूतियों को सिर्फ प्रतिबिम्बित नहीं करती. उनके होने को भी सम्भव बनाती है। अनुभूति और अभिव्यक्ति में अक्षम होकर मनुष्य का विकास उल्टी दिशा में होने लगता है। हमारे समाज की हालत की एक स्वीकारोक्ति देखें:


"कोई बोलने से ज़्यादा हकलाता हो

चलने से ज़्यादा लँगड़ाता हो

देखने से ज्यादा निगाहें फेरता हो

जान लो मेरे ही कबीले से है"

                             ('दूसरी तरफ़')


उल्लेखनीय है कि भाषा के प्रश्न को उचित महत्त्व देता हुआ कवि अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने में कोई कोताही नहीं करता। यही वो तरीक़ा है, जिससे किसी समाज में सार्थक बहस चल सकती है, वरना अपने-अपने स्वयंसिद्ध निष्कर्षों की खोल में सुरक्षित बुद्धिजीवियों की तमाम जमातें तो हमारे इर्द-गिर्द 'सक्रिय' ही हैं। हिन्दी को जनभाषा के बजाय देवभाषा बनाने वाली प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करने के लिए वह अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित शब्द 'जल' का प्रयोग उनकी भाषा के प्रतीक के रूप में करता है। कबीर ने भी कहा था कि 'संस्कीरत है कूप जल भाखा बहता नीर'। ज़रा देखें, इस कूप का 'मण्डूक' इस प्रसंग में क्या करता है–


"जब तक मैं इसे जल न कहूँ

मुझे इसकी कल-कल सुनायी नहीं देती

मेरी चुटिया इससे भीगती नहीं

मेरे लोटे में भरा रहता है अँधकार

                                         ('पानी')


यह अनायास नहीं है कि इन कूपमण्डूकों के क्षुद्र स्वार्थों का शिकार होकर जब हम अपनी नदियों से प्रेम करना भूल उनकी पूजा करने में लगे हैं, जो उनकी हत्या का ही दूसरा रूप है, तब भाषा में प्रदूषण की पहचान करने के लिए कवि जल और पानी के अन्तर को चुनता है। एक अन्य कविता का अंश देखें:


"यह लीजिये मेरी तमाम आपबीती-

जीवन में अब तक काफ़ी जलप्रदाय विभागों का

जल पी चुका हूँ और हिन्दी में बोलने की

बेकार ही कोशिश करता रहा हूँ।"

                                ('सम्पादक के नाम पत्र')


संग्रह की अनेक कविताओं में निराशा प्रभावी होकर उभरती है, जिनमें ऊपर लिखी पंक्तियाँ भी हैं। 'जलप्रदाय विभागों का जल पी चुकना', घाट-घाट का पानी पीने जैसा नहीं है। इसके बजाय यह जलप्लावन में डूबते-उतराते व्यक्ति के जल पी जाने की अनुभूति कराता है। ऐसे में हिन्दी बोलने की कोशिश बेकार क्यों है। ग़ौरतलब है कि हिन्दी या उर्दू का उल्लेख कवि आमतौर पर आत्मीयता से करता है। जब कभी उनके लिए विशेष रूप का उल्लेख व्यंग्य करने के लिए करना होता है तो उस पर अतिरिक्त ज़ोर देकर उनके सामान्य रूप से उन्हें अलगाता है। निराशा की अभिव्यक्तियाँ और भी हैं-


"मुझे मालूम है उन चीज़ों का हश्र क्या होगा

और उस ज़बान का भी जिसे मैं समझता हूँ

अपनी मातृभाषा

और इस भर्राई सी सपाट आवाज़ का

जो हरदम नहूसत की अलामत बनकर आती है"

                                    ('पुरस्कार समारोह')


यहाँ निराशा का स्वर साफ़ सुना जा सकता है। इसे छिपाने की मंशा कवि की भी नहीं है। लेकिन यह निराशा आए दिन सामने आने वाले निराशावाद से भिन्न है। आजकल अनेक ध्वजवाहक कवि-लेखक बाक़ायदा रणनीति के तहत निराशावाद का प्रचार कर रहे हैं, ताकि उनके अपने पलायन और मौक़ापरस्ती को उचित ठहराया जा सके। दूसरी तरफ़ आशावाद को अकर्मण्यता और नियतिवाद का पर्याय बना देने वाली तोता-रटन्त बातें भी हैं। इनके बरक्स खरी और उत्कट निराशा मूल्यवान है, क्योंकि वह मानवीय जिजीविषा को जगा सकती है। अँधेरे का सागर गहरा है इसमें शक नहीं, लेकिन उसमें डूबकर उसे पार करने का विकल्प मनुष्य के सामने हमेशा मौजूद है। दूसरी बात यह कि असद ज़ैदी के यहाँ इस निराशा के कारणों का बहुत स्पष्ट उल्लेख है। यानी अगर कारणों को दूर किया जा सके तो निराशा का अन्त हो सकता है। यह पद्धति बुद्ध के चार आर्य सत्यों की याद दिलाती है। दुःख और उसके कारण का ज्ञान है, उससे निवारण की राह भी इसी से निकलेगी। ये कविताएँ अपने पाठकों को इसी रास्ते की खोज का आमंत्रण देती हैं। स्थापित की आलोचना से ही नवनिर्माण की राह खुलती है, दिशा स्पष्ट होती है। बक़ौल मुक्तिबोध :


"बिना संहार के, सर्जन असम्भव है;

समन्वय झूठ है,

सब सूर्य फूटेंगे

व उनके केन्द्र टूटेंगे

उड़ेंगे खण्ड

बिखरेंगे गहन ब्रह्माण्ड में सर्वत्र

उनके नाश में तुम योग दो!!"

              ('अन्त:करण का आयतन')


संग्रह पर वापस आयें तो इसका नाम बरबस ही ध्यान खींचता है— 'सामान की तलाश'। हमारे समय में जबकि चारों ओर सामान ही सामान है, आख़िर ये किसकी तलाश है। अपनी परम्परा में 'सामान' शब्द का इस्तेमाल किन-किन अर्थों में हुआ है, इसकी छानबीन करते हुए दाग़ का यह शेर मेरे हाथ लगा, जो इस प्रसंग में काफी मौजूं जान पड़ता है–


"होशो-हवास ताबो-तवाँ दाग़ जा चुके

अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया"


इस तलाश को सन्दर्भ देने वाली कविता है 1857 : सामान की तलाश'। यानी हमारा जो सामान 1857 में खो गया था, वह उसी की तलाश है। यह हमारी भारतीय सभ्यता की चेतना और उसके सामर्थ्य की खोज है। इसी के गुम होने से हम बेहोश-से पड़े रहे हैं। बिना अधिक विस्तार में गये कवि ने इस सभ्यता की विशेषताओं का संकेत किया है, और इसके गुम होने से आये भटकावों का उल्लेख भी। कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ हैं :


"1857 की लड़ाइयाँ जो बहुत दूर की लड़ाइयाँ थीं

आज बहुत पास की लड़ाइयाँ हैं


ग्लानि और अपराध के इस दौर में जब

हर ग़लती अपनी ही की हुई लगती है

सुनायी दे जाते हैं ग़दर के नगाड़े और

एक ठेठ हिन्दुस्तानी शोरगुल

भयभीत दलालों और मुखबिरों की फुसफुसाहटें

पाला बदलने को तैयार ठिकानेदारों की बेचैन

चहलकदमी"


यहाँ पहली दो पंक्तियों में समय का वही विशिष्ट बोध है, जो हम पहले देख चुके हैं। अतीत की कोई याद है जो भविष्य की आहट बन जाती है। 'बहुत पास की लड़ाई' भविष्य के '1857' की है, जिसमें हम अपनी खोई हुई आत्मवत्ता प्राप्त कर सकेंगे, बशर्ते हम अपनी पुरानी ख़ामियों से उबर सकें। उस दौर की सबसे बड़ी कमी थी सचेत स्तर पर अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य को न ग्रहण कर पाना। हालाँकि यह परिप्रेक्ष्य विकसित हो रहा था, पर संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर रणनीति तय करने वाली प्रवृत्तियों की जड़ें समाज में ख़ासी मज़बूत बनी रह गयीं। भारतीय सैनिकों के नज़रिये में वह बड़ा राजनीतिक लक्ष्य नहीं था, जिसके अधीन दूसरे सभी हित आ जाते हैं। अंग्रेज़ों के पास इस महान भूभाग पर साम्राज्य की स्थापना और उसकी रक्षा के रूप में वह लक्ष्य मौजूद था, जिसका निर्यात बाद में भारतीयों को करने में भी उन्हें सफलता मिल गयी। इसी के चलते भारतीय खेमे में भ्रम, अविश्वास, फूट और भितरघात के दृश्य अधिक दिखाई।पड़ते हैं। '1857' अब इतने पास आ चुका है कि उसके नगाड़े की आवाज़ भी सुनाई पड़ रही है, और इससे भयभीत दलालों, मुखबिरों और ठिकानेदारों की गतिविधियाँ भी सामने आने लगी हैं। यह अतीत का बिम्ब नहीं, वर्तमान का सच है, जिसे यथार्थवाद के स्टीरियोटाइप के सहारे नहीं समझा जा सकता। 1858 में रानी के घोषणा-पत्र से बाक़ायदा हिन्दुस्तान में जिस दलालतंत्र की स्थापना हुई, और जिसे अधिक सुगम बनाने के लिए 1947 में देश को दो टुकड़ों में बाँटा गया, यहाँ उसी का किस्सा बयान किया गया है :


"पर यह उन 150 करोड़ रुपयों का शोर नहीं

जो भारत सरकार ने 'आज़ादी की पहली लड़ाई' के

150 साल बीत जाने का जश्न मनाने के लिए मंजूर किये हैं

उस प्रधानमंत्री के क़लम से जो आज़ादी की हर लड़ाई पर

शर्मिन्दा है और माफ़ी माँगता है पूरी दुनिया में

जो एक बेहतर गुलामी के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए

कुछ भी

कुरबान करने को तैयार है

यह उस सत्तावन की याद है जिसे

पोंछ डाला था एक अखिल भारतीय भद्रलोक ने

अपनी-अपनी गद्दियों पर बैठे बंकिमों और अमीचन्दों

और हरिश्चन्द्रों

और उनके वंशजों ने

जो खुद एक बेहतर ग़ुलामी से ज़्यादा कुछ नहीं

चाहते थे।"


बेहतर ग़ुलामी का लक्ष्य रखने वाले वर्तमान प्रधानमंत्री से लेकर हिन्दी और बंग्ला नवजागरण के नायकों तक को एक सूत्र में पिरोकर इस कविता ने हिन्दी साहित्य में 150 वर्षों से स्थगित एक तथ्य को प्रकट भर किया है। इस भद्रलोक की अखिल भारतीयता अंग्रेज़ों की ही देन थी। 1857 के बाद इसे सुनियोजित ढंग से विद्रोही चेतना के ख़िलाफ़ अपने ढिंढोरचियों के रूप में तैयार किया गया था। किसी पराजित मुक्ति-संघर्ष के साथ जो बदतरीन विश्वासघात हो सकता है, 1857 के साथ रामविलास शर्मा और उनके अनुयायियों ने किया है। ऐसा उन्होंने 1857 के प्रबल समर्थक के रूप में उसकी विरासत को 'बेहतर गुलामी के लिए काम करने वाली परम्परा' के हाथों में सौंपकर किया है। समर्थन, विकृति और समाहार का यह पुराना वर्णाश्रमवादी हथकण्डा है। नवजागरण और राष्ट्रीय आन्दोलन की परम्परा को अगर 1947 की परम्परा का नाम, पुकारने की सुविधा के लिए, दे दें तो 1857 आज़ादी के लिए समझौताहीन संघर्ष और साम्प्रदायिक एकजुटता का प्रतीक है, जबकि 1947 साम्प्रदायिक बँटवारा और बेहतर ग़ुलामी के लिए समझौतापरस्ती का। इन बातों से इत्तेफ़ाक न रखने वालों को कुछ आसान से सवालों के हल ढूँढ़ने होंगे। उनकी सहायता के लिए हम उन्हें यहाँ दिये देते हैं:


(1) क्या वजह है कि जिसे हम आज़ादी का आन्दोलन

कहते हैं, वह अन्ततः बँटवारे का आन्दोलन साबित हुआ?


(2) अगर वह सचमुच आज़ादी का ही आन्दोलन था तो 1947 के बाद नागरिक जीवन से आज़ादी घटते- घटते आज समाप्तप्राय क्यों हो गयी और साम्प्रदायिकता का नासूर बढ़ते-बढ़ते गैंग्रीन कैसे बन गया? इसमें पुलिस-प्रशासन की क्या भूमिका है ?


(3) अगर भारत का शासक वर्ग दलाल नहीं था तो उसने बिना ची-चपड़ किये अमरीकी साम्राज्यवाद के सामने धोती क्यों खोल दी? (कृपया उत्तर देते समय जार्ज फ़र्नाण्डीज़ का ज़िक्र न करें।) अमरीका का एशियाई लठैत बनने के चक्कर में हमारी सम्प्रभुता का क्या हुआ?


(4) अगर नेहरू अच्छे थे और मनमोहन बुरे हैं तो इनके बीच वह कौन-सा बिन्दु है जब आज़ादी की ओर उन्मुख नीतियाँ सिर के बल खड़ी हो गयी थीं, और क्यों?


जैसा कि स्पष्ट है, ये प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए अगर इनमें से एक का भी सन्तोषजनक उत्तर मिल जाये तो 1947 की भूमिका पर पुनर्विचार हो सकता है।


बहरहाल, कविता का मूल कथ्य आगामी 1857 के लिए आगाह करना है ताकि उन दलालों और ठिकानेदारों के उत्तराधिकारियों को इस बार सन्देह का लाभ न मिल सके। पिछली गलतियों से सबक लेकर हमें इस बार दुश्मन की हर चाल का माकूल जवाब देने की दक्षता हासिल करनी पड़ेगी :


"1857 में मैला-कुचैलापन

आम इन्सान की शायद नियति थी, सभी को मान्य

आज वह भयंकर अपराध है

लड़ाइयाँ अधूरी रह जाती हैं अक्सर, बाद में पूरी

होने के लिए

किसी और युग में किन्हीं और हथियारों से"


हमारे इतिहास की राष्ट्रवादी समझ के मुताबिक, जिसे बनाने में पेशेवर इतिहासकारों के अलावा जवाहरलाल नेहरू और ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद जैसे लोग भी शामिल हैं, अपने तमाम शौर्य और बलिदान के बावजूद 1857, बुनियादी तौर पर आधुनिक पूँजीवाद के खिलाफ़ सामन्ती शक्तियों का विद्रोह था। इस प्रकार उसका चरित्र प्रतिगामी था। इसी वजह से उसकी पराजय अनिवार्य थी, और ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से उचित भी। इन तथाकथित राष्ट्रवादियों को पूँजीवाद, उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद में कोई फ़र्क़ समझ में नहीं आता। यही 1947 की परम्परा है। इसकी पोल वर्तमान यथार्थ के बिन्दु पर ही खुलती है। हमारा देश और समाज आज जिस मुकाम पर पहुँच गया है, उसकी पूरी जिम्मेदारी इसी धारा की है। भारतीय जनता की मुक्ति और राष्ट्र के नवनिर्माण की राह में यह बड़ा रोड़ा है। कविता, अन्त में, इसी को सम्बोधित करके एक सवाल करती है, जो दरअसल 1857 का सवाल है, 1947 से पूछा गया :


"1857 के मृतक कहते हैं भूल जाओ हमारे सामन्ती

नेताओं को

कि किन जागीरों की वापसी के लिए वे लड़ते थे

और हम उनके लिए कैसे मरते थे

कुछ अपनी बताओ

क्या अब दुनिया में कहीं भी नहीं है अन्याय

या तुम्हें ही नहीं सूझता उसका कोई उपाय।"



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