अँधेरे में
अँधेरे में:मुक्ति का स्वप्न --- कृष्णमोहन ज्ञान और कर्म के साथ-साथ परंपरा और आधुनिकता, अतीत और वर्तमान तथा आंतरिक और वाह्य के द्वंद्व भी मुक्तिबोध की कविताओं की मूलभूत संरचना में निहित हैं। ब्रह्मांड की पृष्ठभूमि में इतिहास के रंगमंच पर चलने वाले इस नाटक में इन तत्वों की परस्पर अंतःक्रिया को न समझ पाने के कारण कई बार इन कविताओं को समझने में बाधा पड़ती है। 'अँधेरे में' के आरंभिक अंशों में ही कविता के उपरोक्त तीनों मूलभूत द्वंद्व सामने आ जाते हैं। कविता में आगे उनका विकास होता है। कविता का नायक 'मैं' निर्विवाद रुप से एक मध्यवर्गीय बौद्धिक व्यक्ति है। कविता का दूसरा चरित्र एक भव्य और रहस्यमय व्यक्ति-आकृति है जो गुफा से लेकर जन-आंदोलन तक में दिखाई पड़ती है। काव्यनायक की इस व्यक्ति-आकृति के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया के माध्यम से कविता का विकास होता है, और अंत तक दोनों का द्वंदात्मक संबंध ही कविता की दिशा को निर्धारित करता है। इसलिए इस दूसरे चरित्र की वास्तविक भूमिका का निरूपण कविता को समझने ...